प्रणब मुखर्जी (Pranab Mukherjee) ने अपनी किताब में लिखा है कि उनके राष्ट्रपति बनने के बाद पार्टी नेतृत्व ने राजनीतिक दिशा खो दी. सोनिया गांधी पार्टी के मामलों को संभालने में असमर्थ थीं, तो मनमोहन सिंह की सदन से लंबी अनुपस्थिति के चलते सांसदों के साथ व्यक्तिगत संपर्क पर विराम लग गया.
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